कूटनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस करने में जुटे हैं ट्रम्प

2018-07-16 15:25:00

कूटनीति के बारे में अकसर कहा जाता है कि उसकी गति धीमी होती है, और वह सुर्खियों में भी नहीं रहती। यह स्नेहपूर्ण और दोस्ती का रुख रखती है, लेकिन चौकन्नी भी। विश्व के तमाम समझौते और वैश्विक संबंध अहम कूटनीति के लिहाज से चलते हैं।

लेकिन अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने मानो कूटनीति और पूरे सिस्टम को तहस-नहस करने की कसम खा रखी है। क्योंकि वह गुस्सैल सांड की तरह सभी आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को कुचलने में जुटे हैं। राष्ट्रीय हितों के लिहाज से देखा जाये तो यह बचकाना हरकत है। ट्रम्प के हीरो विंस्टन चर्चिल ने कूटनीति की व्याख्या इस तरह की है,“लोगों को नर्क में जाने की बात इस तरह कही जाये कि वे वहां का रास्ता पूछें”। लगता है ट्रम्प ने चर्चिल को पढ़ना छोड़ दिया है।

ट्म्प के बयान और करतूतों से साफ हो गया है कि वह व्यापारिक हमले अपने सहयोगियों, प्रतिद्वंद्वियों आदि पर कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति यह बात भी भूल गए हैं कि दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी होती है, विभिन्न देश आम हितों के लिए मिल जुलकर काम कर सकते हैं। वह लगातार यूरोप, कनाडा आदि के खिलाफ तमाम व्यापारिक कर लगाकर रिश्तों को खराब कर रहे हों। जबकि चीन के खिलाफ वे और उग्र हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर रोजगार और खुशहाली पर बुरा असर पड़ेगा।

वैसे भी अमेरिका की विदेश नीति में अकसर छोटे और कम शक्तिशाली देशों को डराने की प्रवृति रही है। लेकिन ट्रम्प कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो चुके हैं। वह कम समय में विजेता बनना चाहते हैं और दूसरों को इसके लिए हारना होगा। ट्रम्प को समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध बिजनेस डील की तरह नहीं होते। बहुपक्षीय रिश्ते बनने में कई साल लगते हैं, लेकिन टूटने में बिल्कुल भी समय नहीं लगता। ईरान का परमाणु समझौता और पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता ट्रम्प की कोशिशों के बावजूद खत्म नहीं हुए। लेकिन वाशिंगटन को जरूर नुकसान पहुंचा है।

अनिल पांडेय

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