काम के साथ अच्छा व्यवहार भी ज़रूरी - राकेश श्रीवास्तव

2019-06-12 14:38:00

पिछले दिनों आपने सब टीवी के एक बेहद मशहूर सीरियल लापतागंज में लल्लन जी को ज़रूर देखा होगा, और उनका खास डायलॉग – हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं – बच्चे बच्चे की ज़बान पर है। लल्लन जी यानी राकेश श्रीवास्तव जी लापतागंज से पहले भी कई टीवी सीरियल और फिल्मों में महत्वपूर्ण किरदार निभा चुके हैं, लेकिन स्क्रीन पर आने से पहले राकेश जी ने नाट्य मंचों पर अपनी कला का जलवा खूब बिखेरा है। राकेश के पिताजी रिज़र्व बैंक में थे जिसके चलते इन्हें देश के कई शहरों में घूमने का मौका मिला और इसकी वजह से राकेश में आत्मविश्वास या फिर यूं कहें कि कुछ कर गुज़रने का दृढ़ विश्वास था। जगह जगह घूमने से राकेश को एक्सपोज़र भी बहुत मिला जिसका इन्हें अभिनय की दुनिया में बहुत लाभ मिला।

मूलत: लखनऊ के रहने वाले राकेश श्रीवास्तव को पटना में एक बांग्ला स्कूल में पढ़ते समय जहां पर थियेटर, नाटक और रविन्द्र संगीत का कार्यक्रम आयोजित होता था, वहां से इनका रुझान नाटक और संगीत की तरफ़ हुआ। इसमें राकेश का मन इतना रमा कि आगे चलकर इन्होंने न सिर्फ़ इसे अपनी जीविका का साधन बनाया बल्कि खूब नाम भी बटोरा।

लखनऊ में ग्रैजुएशन करते समय राकेश श्रीवास्तव भारतेन्दु नाट्य अकादमी से जुड़े, जहां पर राकेश ने दो साल का डिप्लोमा किया, फिर पोस्ट डिप्लोमा किया वहीं पर इन्होंने टेलिवीज़न और थियेटर किया, साल भर के बाद वहां ड्रामा स्कूल में पढ़ाने लगे करीब सवा दो साल तक वो इसमें जुटे रहे। बाद में संगीत महाविद्यालय से संगीत मूल्यांकन का कोर्स किया, क्योंकि राकेश को अच्छे संगीत की समझ है और ये अच्छे संगीत श्रोता बनना चाहते थे, इसके बाद राकेश ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट में फिल्म मूल्यांकन का कोर्स किया, अपने मन की बात सुनकर राकेश ने वहीं से वापस लखनऊ न जाकर मुंबई का रुख किया और फिर शुरु हुआ राकेश श्रीवास्तव का फिल्मी सफ़र, हालांकि ये सफ़र संघर्ष से भरा हुआ था। राकेश संघर्ष बोलने के बजाय इसे प्रसाय बोलना ज्यादा सही समझते हैं क्योंकि ये शब्द सकारात्मकता से भरा हुआ है।

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