इतिहास का सिंहावलोकन --- तिब्बत की ओर जन मुक्ति सेना का अभियान

2019-08-08 14:03:00

लेकिन तिब्बत की स्थानीय सत्ता ने विदेशी शक्तियों के समर्थन से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की शांतिपूर्ण मुक्ति योजना को अवरुद्ध और अस्वीकृत किया। उन्होंने वार्ता का द्वार बन्द किया और चिनशा नदी के तट पर तथा छांगतु क्षेत्र में सैनिक विन्यास किया ताकि बल के सहारे जन मुक्ति सेना को रोका जाए। इसी स्थिति में चीनी जन मुक्ति सेना ने लड़ाई लड़कर छांगतु में तैनात तिब्बती स्थानीय सशस्त्र बल को भंग दिया। यह चीनी जन मुक्ति सेना द्वारा अपने राष्ट्रीय भूमि की मुक्ति करने का न्यायसंगत कार्यवाही है। लेकिन विदेशी प्रतिक्रियाशील शक्तियों ने इस कार्यवाही को बदनाम किया। तथ्यों से साबित है कि विदेशी प्रतिक्रियाशील बल हमेशा से दुष्टाचार रुख अपनाते थे। साम्राज्यवाद और विदेशी प्रतिक्रियावादियों के समर्थन से तिब्बत की स्थानीय सरकार ने चिनशा नदी के तट तथा छांगतु क्षेत्र में सात हजार सिपाहियों की तैनाती की। लेकिन चीनी जन मुक्ति सेना के सैनिकों ने पार्टी की केंद्रीय कमेटी के आदेश के मुताबिक उत्तर और दक्षिण दोनों दिशा से तिब्बती सेना को घेरा दिया। लड़ाइयां सन 1950 की 6 से 24 अक्तूबर तक चलीं। 19 दिनों की लड़ाइयों के बाद तिब्बती सेना को हराया गया, कुछ सिपाहियों ने आत्मसमर्पण किया और कुछ ने विद्रोह किया। तिब्बत की ओर मार्चिंग करते समय जन मुक्ति सेना ने कड़े अनुशासन का पालन किया और तिब्बती देशबंधुओं ने उनका हार्दिक स्वागत और समर्थन किया। मिसाल के तौर पर नम्बर 18 सेना के सैनिकों ने भूख से ग्रस्त होने के बावजूद स्थानीय किासनों व चरवाहों से अनाज नहीं मांगा। उन्हों ने चांदी डॉलर के माध्यम से स्थानीय लोगों के यहां से खाद्य चीजें खरीदीं। जन मुक्ति सेना के कड़े अनुशासन के मुताबिक स्थानीय किसानों व चरवाहों के यहां से कोई भी संपत्ति निशुल्क तौर पर लेना सख्त मना था।   

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