चीन-भारत संबंध: चीन और भारत के बीच तुलना

2017-11-14 14:39:02

चीन और भारत के बीच तुलना करना एक व्यापक टॉपिक है और तमाम विश्लेषकों ने इस सवाल को लेकर कई लेख लिखे हैं । अब आइये सुनते हैं, चाइना रेडियो इंटरनेशनल के बुजुर्ग टिप्पणीकार की इस बात पर समीक्षा ।

सपना – यह चाइना रेडियो इंटरनेशनल है। सभी श्रोताओं को सपना की नमस्ते ।

हू – और सभी श्रोता दोस्तों को हूमिन का भी नमस्कार ।

सपना – चीन और भारत की अकसर तुलना की जाती है और तमाम विद्वानों और विश्लेषकों ने इस सवाल को लेकर कई लेख लिखे हैं । मुझे अच्छी तरह पता है कि आप लंबे समय तक भारत में रह चुके हैं और इन दो महान देशों की तुलना में आपके भी अपने विचार हैं । और आपने ऐसे विश्लेषण को खारिज किया है कि चीन-भारत संबंध एक ड्रैगन और एक हाथी जैसे प्रतियोगिता वाले संबंध हैं । आपके विचार में चीन और भारत जंगल में घूमने वाले दो हाथी हैं या साथ-साथ खड़े दो पेड़ों के जैसे हैं ।

हू – जी हां । मैं हमेशा से इस बात पर कायम रहा हूं कि चीन और भारत की तुलना में केवल आर्थिक आंकड़े बताना बेकार है । आर्थिक विकास की मात्रा या आंकड़े आसानी से बदल सकते हैं । लेकिन किसी राष्ट्र का भाग्य इसकी आंतरिक गुणवत्ता से संबंधित है । मैं इसीलिए ड्रैगन और हाथी के वर्णन से सहमत नहीं हूं, क्योंकि बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि चीन और भारत के संबंध प्रतियोगिता और दुश्मनी के जैसे हैं । लेकिन मेरे विचार में चीन और भारत एक ड्रैगन और एक हाथी नहीं, पर दो भाइयों के जैसे होते हैं । चीन और भारत समान देश हैं, वे जंगल में साथ-साथ रह रहे दो हाथी या दो पेड़ ही हैं ।

सपना – लेकिन मुझे याद है कि आप भी कई बार कह चुके थे कि भारत एक धार्मिक देश है जबकि चीन सेक्युलर है । इसमें जो फर्क है वह बहुत बड़ा है । इसलिए चीन-भारत संबंधों के अनुसंधानक्रताओं को इस बात पर जरूर ध्यान रखना पड़ता है ।

हू – जी हां । मैं बहुत लंबे समय से चीन-भारत संबंधों के विकास पर ध्यान देता आया हूं और मेरे भारत के प्रति निष्कर्ष का बदलाव भी निरंतर जारी है । कई साल पहले मुझे विश्वास था कि भारत एक पूरी तरह धार्मिक देश है जबकि चीनी लोग सेक्युलर हैं, इसी स्थिति में दोनों के बीच बातचीत करने में हमेशा से बाधा मौजूद है । लेकिन कुछ साल बाद मैं अपने प्रारंभिक विचारों को बदलने पर मजबूर हुआ, मैंने अपने विचारों का कई बार खंडन किया । भारतीय लोगों के साथ लंबे समय तक रहने के बाद यह तर्क निकला है कि भारतीय लोग भी व्यवहारवादी हैं और चीनी लोग भी आदर्शवादी हैं ।

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