शांगहाई की चैती संस्था बनी भारतीयता की पहचान

2018-05-26 15:02:04

भारत की दुनिया में पहचान क्या है और क्या होनी चाहिए, यह हमेशा से एक बड़ा सवाल है । इस सवाल का उत्तर खोजने की कोशिश की, भारत के युवाओं ने शंघाई में भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अलग तरह से पहचाना युवाओं ने और चैती संस्था को माध्यम बनाया।

चैती ने शंघाई में भारतीय क्लासिक गीत, संगीत और नृत्य में बहुत सुंदर और भव्य प्रस्तुतियां कराई हैं । पिछले पांच सालों में चैती का प्रदर्शन अपने सांस्कृतिक विरासत को चीन में पहुंचाने का ही नहीं रहा है अपितु वह चीन वासियों को भारतीय दर्शकों का मंच भी सुलभ करा रहे हैं। सिद्धार्थ सिन्हा और उनके दोस्तों ने मिलकर जो अभियान शुरू किया है धीरे-धीरे उसे भारतीयों के साथ-साथ चीनी दर्शकों का भी एक मंच मिलने लगा है । शंघाई में अनेकानेक भारतीय समूहों में चैती ने अपना विशेष स्थान बनाया है तो उसके पीछे उसका खास दर्शन है कि भारतीय कलाओं की असली पहचान उसकी परम्पराओं कलाओं में है उसके बॉलीवुड संगीत-नृत्य संगीत से नहीं । इसलिए उसकी कलाओं की पहचान भारतीय क्लासिकी में ही करनी चाहिए । चार दोस्तों ने इस विचार को अमली जामा पहनाया और 2012 में चैती नाम से शुरू हुआ यह सफर महत्वपूर्ण तरीके से चीन की कलासंस्थाओं में शुमार की जाने लगी है । इस साल 2 जून से चैती के यह आयोजन होने वाले हैं। जिसमें उस्ताद शुजात खान सितार के साथ सुरों को छेड़्ने वाले हैं उनके साथ अमित चौबे और बिभाकर चौधरी तबले पर रहेंगे और भारतीय क्लासिक कुचिपुड़ी नृत्य में भारतीय जुगलबंदी वैजयंती काशी और प्रतीक्षा काशी के साथ चीनी नृत्यांगना लुलू वांग की है ।

पिछले छ: वर्षों से चीन में भारतीय शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य और कला कार्यक्रमों में भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों को चीन में दर्शकों से रूबरू कराते हैं इस बार यह कार्यक्रम 2 जून को शंघाई और 8 जून 2018 को सूज़ौ में आयोजित हो रहे हैं । चैती आर्ट्स फेस्टिवल कार्यशालाओं, कक्षाओं के माध्यम से संगीत, कला चीन में भारतीय कला की जागरूकता और गहरी समझ बनाने और जोड़ने में लगा है। सामुदायिक एकजुटता और पारस्परिक सम्मान पैदा करने में कला और संस्कृति मजबूत स्तम्भ हैं संगीत और कलाओं में भावनाओं को जोड़्ने और सद्भाव बनाने की क्षमता है। इसलिए यह चीन वासियों से भारतीय शास्त्रीय संगीत और भारतीय कला के विश्वस्तरीय भारतीय कलाकारों को जोड़ने वाला यह महत्वपूर्ण मंच बन गया है । भारतीय और चीनी संस्कृति के आदान-प्रदान को मजबूत करने के लिए चैती चीन और भारत कला और संस्कृति की स्वर्णिम पहचान को एक साथ लाने में जुटा है।(पंकज)

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