पश्चिमी देशों को अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को वस्तुगत रूप से देखना चाहिये

2018-06-26 11:12:00

हाल ही में यूरोपीय संघ, कनाडा, मैक्सिको आदि देशों ने क्रमशः अमेरिका द्वारा बढ़ाये गये टैरिफ़ का जवाब देने के लिये बराबर कदम उठाए। हालांकि यह अमेरिका व यूरोप के बीच हुआ एक व्यापारिक संघर्ष है, लेकिन पश्चिमी देशों में एक आवाज़ निकलती है कि अमेरिका व यूरोप के व्यापारिक युद्ध का स्रोत चीन है। क्योंकि चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से विश्व में स्टील व एल्यूमीनियम उत्पाद प्रचुरता के साथ मौजूद हैं। लेकिन यह तथ्य बिल्कुल गलत है।

अमेरिकी वाणिज्य मंत्री ने हाल ही में सीनेट में गवाही देते समय कहा कि कनाडा के प्रति अमेरिका का स्टील व लौह व्यापार अधिशेष है। पर अमेरिका ने भी कनाडा के प्रति टैरिफ़ बढ़ाया है। क्योंकि वह चीन के स्टील व लौह उत्पादों को अन्य टैरिफ़ वरीयता प्राप्त देशों से अमेरिकी बाजार में प्रवेश को रोकना चाहता है। अमेरिका का लक्ष्य वास्तव में चीन है।

वर्ष 2008 में अमेरिका के कारण विश्व वित्तीय संकट पैदा हुआ। उस समय चीन के निर्यात में भी नकारात्मक वृद्धि हुई। कुछ उद्यम विवश होकर बंद हुए। इस पृष्ठभूमि में चीन सरकार ने दृढ़ता से 40 खरब वाली पूंजी-निवेश योजना बनाने और अंदरूनी मांग का विस्तार करने समेत सिलसिलेवार आर्थिक प्रोत्साहन कदम उठाये। बाद में चीन की अर्थव्यवस्था विश्व में सब से पहले पुनरुत्थान हुआ। वर्ष 2009 में चीन की आर्थिक वृद्धि 9.2 प्रतिशत है, फिर वर्ष 2010 में 10.3 प्रतिशत तक पहुंच गयी।

चीन के कारण से कांस्य, कोयला, लौह, तेल, लकड़ी आदि अंतर्राष्ट्रीय भारी तिजारती उत्पादों के बाजार कमजोरी से बेहतर बने लगे। उस समय गतिरोध में फंसे कनाडा व ऑस्ट्रेलिया आदि आर्थिक समुदाय भी आर्थिक संकट से मुक्त हो गये। वर्ष 2009 में विश्व की जीडीपी में 50 प्रतिशत की नयी वृद्धि चीन से प्राप्त है। इसी कारण से ही अमेरिका व यूरोप की अर्थव्यवस्था धीरे धीरे बेहतर हो गयी। तभी अंतर्राष्ट्रीय आम राय में चीन के कदमों की खूब प्रशंसा की गयी।

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