टिप्पणी :खट्टे अंगूर के मनोभाव से चीन अफ्रीका व्यावहारिक सहयोग नहीं रोका जा सकता

2018-09-04 19:03:00

इधर दो दिनों में चीन-अफ्रीका सहयोग मंच पेइचिंग में चला। अनेक वर्षों में कुछ पश्चिमी देश और मीडिया चीन अफ्रीका सहयोग पर शंका करते हैं और भ्रमित होते हैं ,लेकिन चीन अफ्रीका सहयोग निरंतर आगे बढ़ता रहता है और निरंतर ठोस उपलब्धियां प्राप्त होती रहती हैं। ध्यानाकर्षिक बात ये है कि फिलहाल चीन अफ्रीका सहयोग का विरोध करने वाले कुछ पश्चिमी मीडिया और थिंक टैंक ने निष्पक्ष रिपोर्ट देने और विवेकतापूर्ण विश्लेषण जारी करने लगे।

तथाकथित ऋण का फंदा सवाल कुछ पश्चिमी मीडिया की मुख्य आशंका रही। अमेरिकी जॉन्स हॉपकिंस स्कूल के चीन-अफ्रीका अध्ययन कार्यक्रम ने वर्ष 2015 में दावा किया था कि अफ्रीकी देशों को चीनी कर्ज भुगतान नहीं करने की बड़ी आशंका है। लेकिन कुछ समय पहले इस अध्ययन कार्यक्रम ने रिपोर्ट जारी कर कहा था कि चीनी कर्ज अफ्रीकी ऋण सवाल का मुख्य कारण नहीं है। अफ्रीकी देशों का ऋण कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से आया है ,न कि एक ही संस्था से।

पश्चिमी मीडिया में ऐसी खबरें भी अक्सर निकलती थीं कि चीनी पूंजी निवेश से अफ्रीका में रोज़गार के अधिक मौके नहीं पैदा हुए। लेकिन सीएनएन ने हाल ही में मेकेन्सी द्वारा जारी एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि चीन ने अफ्रीका में लाखों रोजगार के मौके सृजित किये हैं और दो तिहाई चीनी कंपनियां स्थानीय कर्मचारियों को व्यावहारिक ट्रेनिंग देती हैं।

चीन अफ्रीका सहयोग पर पश्चिमी जगत में अलग अलग आवाज़ उठती थीं, लेकिन चीन का पक्का विश्वास है कि चीन अफ्रीका सहयोग अच्छा है या बुरा, सिर्फ चीनी और अफ्रीकी जनता के पास बोलने का अधिकार है ।कोई भी कल्पना और कयास से चीन अफ्रीका सहयोग में मिली असाधारण उपलब्धियों को नहीं ठुकराया जा सकता। नोबेल अर्थशास्त्र पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिगलित्स ने दो टूक बात कर कहा था कि पश्चिमी जगत अफ्रीका में चीन की कोशिशों की जो आलोचना कर रहा है ,वह एकदम खट्टे अंगूर का मनोभाव है।

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