चीनी दिलों में बसे हैं भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

2018-10-01 19:06:01

जिस दौरान गांधी जी ने अपने प्रसिद्ध असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया, उस समय चीनी जनता ने उस पर खासा ध्यान दिया। उदहारण के लिए, साल 1920-1924 तक के पहले असहयोग आंदलन के दौरान ‘पूर्वी पत्रिका’ में 20 लेख प्रकाशित हुए। इन लेखों में ज्यादातर गांधी और गांधीवाद की बढ़चढ़ कर सराहना की गई। गांधी जी को भारत के विचार-जगत के नेता, महान क्रांतिकारी, समाज सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेखों में व्यक्त आम धारनाएं ये थीं कि गांधी जी की शक्ति ही तत्कालीन भारतीय मानसिक एवं भौतिक जगत का संचालन करती थी। वे पूर्व की शक्ति एवं सभ्यता के प्रतिनिधि थे। सत्य पर अडिग और हिंसा के विरोधी माने जाने वाले गांधी जी चीनी जनता की नजरों में भारत के टालस्टाय थे।

गांधीवादी सोच ने यानी अहिंसक आंदोलनों ने भारतीय स्वाधीनता-संग्राम को एक दृष्टि ही नहीं, बल्कि एक दिशा भी दी। चीनी विद्वानों के लिए यह एक नया दर्शन था। खादी और चरखा आंदोलन गांधी जी के प्रगतिशील विचारों के परिचायक थे। उन लोगों का मानना था कि गांधी जी का मानवतावादी दृष्टिकोण सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए भी रहा है। गांधी जी की देशभक्ति, उनकी अटूट तपश्चर्या, उनके त्याग एवं बलिदान का प्रभाव भारत के अतिरिक्त एशिया के कई अन्य देशों पर भी पड़ा। अफ्रीका, लातिन अमेरिका ने भी गांधी जी के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन से बहुत कुछ प्राप्त किया।

चीनी जनता का गांधी जी के प्रति सदैव श्रृद्धा का भाव रहा है। चीनी जनता अच्छे से जानती है कि चीन के सबसे कठिन दौर में गांधी जी ने सैद्धांतिक और भौतिक तौर पर उसका समर्थन किया था। चीनी जनता के दिलों में यह याद अभी भी बाकि है और वह इसके लिए आभार मानती है। आज दोनों देशों की परंपरागत मैत्री को और अधिक विकसित करने के लिए महात्मा गांधी को याद करना और अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। दोनों देशों की बीच सदियों से चली आ रही पंरपरागत मैत्री को प्रगाढ़ करने में गांधी जी की विचारधारा भविष्य में भी अपना बहुमूल्य योगदान दे सकती है। इन दोनों देशों की मैत्री अवश्य ही विश्व कल्याण में सहायक सिद्ध होगी।

(अखिल पाराशर)

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