टिप्पणी:थाईवान को ख़तरे में कौन लाएगा ?

2018-10-23 13:08:00

अमेरिकी उप राष्ट्रपति माइक पेंस ने अक्तूबर की शुरूआत में चीन की निंदा करने का एक लेख जारी किया, जिसमें चीन पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हस्तक्षेप करने, अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने और थाईवान के जलडमरुमध्य की स्थिरता को खतरा पहुंचाने की टोपी रखी गई। हाल ही में अमरिकी सेना ने लगातार थाईवान के संबंधित मामलों पर कार्यवाही की। इन कदमों से चीन-अमेरिका संबंध, थाईवान जलडमरू मध्य के दोनों तटों के बीच संबंधों में बाधा डाली जाएगी। थाइवान के छाई यिंग वन प्रशासन ने अमेरिका की कार्यवाही का सक्रिय रूप से जवाब दिया, जिससे थाईवान को खतरे में लाया जाएगा।

पहला, अमेरिका थाईवान मामले से देश के आंतरिक अंतरविरोध को स्थानांतरित कर रहा है, चीन और अमेरिका के बीच संघर्ष का नया मोर्चा खोलना चाहता है। अमेरिकी सरकार की इन कार्यवहियों का प्रमुख कारण है मध्यकालीन चुनाव आ रहा है, अमेरिका की घरेलू स्थिति से राजनीतिक चिंता हुई है। व्हाइट हाउस ऐसी कार्यवाही से अमेरिकी जनता का ध्यान नकारात्मक मुद्दों से हटाकर कहीं और लगाना चाहती है।

लेकिन अमेरिका की इस कार्यवाही से हिंद-प्रशांत रणनीति की झलक मिलती है, जिनमें चुनाव में हस्तक्षेप करने के लिये चीन पर हमला करना शामिल है।

अमेरिकी सेना हाल ही में दक्षिणी चीन सागर, थाईवान जलडमरू मध्य और प्रशांत महासागर के कई क्षेत्रों में बड़े सैन्य अभ्यास करेगी। यह चीन की मुख्यभूमि के लिए अमेरिका की उत्तेजना है ।अमेरिका चीन की राजनीतिक सहनशीलता को भी परखना चाहता है।

दूसरा, अमेरिका थाईवान का सुरक्षक नहीं है। छाई यिंग वन बाहरी शक्ति पर निर्भर रहकर अपना भावी रास्ता बंद करेगी। लेकिन चाहे अमेरिका और थाईवान के बीच रिश्ते किसी भी तरह आगे बढ़ें, तो व्हाइट हाउस अमेरिका की प्राथमिकता के ढांचे से छुटकारा नहीं पा सकता।

वास्तव में थाईवान पर ट्रम्प सरकार की नीति है कि थाईवान को अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए ठोस लाभ और राजनीतिक समन्वय प्रदान करने दें। इस अर्थ में थाईवान की तथाकथित स्वाधीनता के पक्षधर लोग थाईवान को खतरे में लाने का कारण बन रहे हैं।

(वनिता)

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