टिप्पणीः अमेरिकी 301धारा से चीन के विकास को रोकना चाहता है

2018-10-25 17:02:00

द साउथ सेंटर की स्थापना वर्ष 1995 में हुई, जिसका उद्देश्य दक्षिण दक्षिण की एकता, सहयोग और दक्षिण और उत्तर के बीच पारस्परिक समझ बढ़ाना है। इस रिपोर्ट में अमेरिकी 301 धारा के इतिहास और गैरकानूनी, भ्रामक अमेरिकी कार्रवाई का व्याख्या की गई है।

301 धारा अमेरिका के वर्ष 1974 के व्यापार कानून से आती है, जो अमेरिका द्वारा विदेशी बाज़ार का विस्तार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण है। पिछली सदी के 80 और 90 के दशक में 301 धारा को बदनामी मिली थी। उस समय अमेरिका अकसर इसका प्रयोग कर किसी अमेरिकी उद्यम की शिकायत के बिना अपने व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ पड़ताल करता था।

द साउथ सेंटर की रिपोर्ट में कहा गया कि इस साल अमेरिका की 301 जांच में चीन पर जो आरोप लगाया गया है ,वह वास्तव में डब्ल्यूटीओ के मापदंड की जगह अपने मापदंड से चीन की समीक्षा करता है ।

रिपोर्ट में कहा गया कि चीन में पूंजी निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनियों ने स्वेच्छा से तकनीकी हस्तांतरण समेत समझौता संपन्न किया, क्योंकि वे जानती हैं कि वे चीन के विशाल बाज़ार में भारी लाभ मिलेगा। ये सब उद्यमों के बीच ठेके के अनुसार उठाये गये कदम हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि चीन ने बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षण में भारी प्रगति हासिल की है। अनुसंधान और विकास में चीन के निवेश में बड़ी वृद्धि हुई है और तकनीकी सृजन को बड़ा बढ़ावा मिला। उदाहरण के लिए चीन के अनुसंधान, विकास की धनराशि का अनुपात अब पूरे विश्व का 20.8 प्रतिशत है।

रिपोर्ट ने सारांश में कहा कि अमेरिकी सरकार द्वारा धारा 301 का प्रयोग करने का असली कारण व्यापार से संबंधित नहीं है। इसके

उपरित अमेरिकी धारा 301 के प्रयोग से चीन दवारा वैधिक रूप से औद्योगिक और तकनीकी विकास को रोकने की कोशिश कर रहा है।

(वेइतुंग)

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