टिप्पणीः क्या मध्यपूर्व शांति सम्मेलन शांति लाएगा?

2019-02-14 18:31:00

मध्य-पूर्व मुद्दे पर मंत्री स्तरीय सम्मेलन 14 फरवरी को पोलैंड की राजधानी वारसा में समाप्त हुआ। अमेरिका और पोलैंड ने संयुक्त रूप से यह सम्मेलन आयोजित किया था। इस सम्मेलन का मुख्य विषय मध्य पूर्व की भावी शांति और सुरक्षा को बढ़ाना है ,लेकिन इसका असली मकसद मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान के तथाकथित खतरे की तरफ़ ध्यान खींचना था । इसपर ईरान ने जबरदस्त असंतोष व्यक्त किया है। रूस ने इसमें भाग लेने से इंकार किया । ब्रिटेन ,फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों ने ठंडा रुख अपनाया ।कहा जा सकता है कि इस बैठक में ठोस उपलब्धि नहीं मिली।

पोलैंड ने अमेरिका के साथ इस बैठक का आयोजन किया ।यह थोड़ी हैरानी की बात है ,क्योंकि इससे पोलैंड और ईरान के संबंधों को नुकसान पहुंचेगा ।लेकिन पोलैंड क्यों इस बैठक का मेजबान बनना चाहता था ? इसका मुख्य कारण वह अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखना चाहता है। लंबे अरसे से पोलैंड-रूस संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। पोलैंड को अमेरिका का सहारा लेकर रूस के साथ मुकाबला करने का इरादा है। इसलिए उसने मध्य-पूर्व मुद्दे पर अमेरिका का समर्थन किया है। ध्यान रहे इस अप्रैल में अमेरिकी सेना पोलैंड में नया सैन्य अड्डा खोलेगी।

यूरोप में आयोजित इस बैठक ने ईरान सवाल पर अमेरिका और यूरोप के मतभेद दूर नहीं किये। इस बैठक में यूरोपीय संघ ने ईरान के मुद्दे पर फोकस रखने का विरोध जताया और यूरोपीय संघ के कूटनीति और सुरक्षा नीति वरिष्ठ प्रतिनिधि फ्रेडरिका मोघरिनी ने भाग नहीं लिया। इनसब से जाहिर है कि यूरोपीय संघ खुले तौर पर अमेरिका के साथ ईरान पर आरोप नहीं लगाना चाहता।

अधिकांश देशों ने वारसा सम्मेलन का बहिष्कार किया। इससे फिर साबित हुआ है कि ईरान सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर मतभेद मौजूद हैं। अमेरिका के लिए अल्प काल में ईरान विरोधी गठबंधन की स्थापना मुश्किल है ।मध्यपूर्व की शांति पूरा करने का लंबा रास्ता होगा ।(वेइतुंग)

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