टिप्पणीः बौद्धिक संपदा संरक्षण की मज़बूती चीन और अमेरिका के हितों से मेल खाती है

2019-02-24 16:01:00

टिप्पणीः बौद्धिक संपदा संरक्षण की मज़बूती चीन और अमेरिका के हितों से मेल खाती है

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में आयोजित सातवें दौर की चीन-अमेरिका आर्थिक व व्यापारिक उच्च स्तरीय वार्ता में व्यापार संतुलन, कृषि, तकनीक स्थानांतरण, बौद्धिक संपदा संरक्षण और वित्तीय सेवा आदि क्षेत्रों में सक्रिय प्रगतियां हासिल हुई हैं। बौद्धिक संपदा संरक्षण को मजबूत करने में चीन और अमेरिका की सहमति बढ़ती जा रही हैं। इस का कारण सर्वविदित है। बौद्धिक संपदा संरक्षण किसी एक सडजन विकास वाले देश की आवश्यक्ता है। विश्व की पहले दो बड़ी आर्थिक इकाइयां होने के नाते बौद्धिक संपदा का संरक्षण चीन और अमेरिका के हित में है।

आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा शक्ति को उन्नत करने के लिए बौद्धिक संपदा का संरक्षण चीन और अमेरिका की समान अपील है। बौद्धिक संपदा मानों एक पुल है, जो नवाचार और बाजार को जोड़ता है। चीन में सुधार व खुलेपन की नीति लागू होने के पिछले 40 सालों में चीन ने पेटेंट कानून, ब्रांड कानून और कॉपीराइट कानून आदि सिलसिलेवार कानूनों व नियमों में संशोधन किया, बौद्धिक संपदा के खास अदालत की स्थापना की और राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा ब्यूरो का पुनःगठन भी किया। निसंदेह चीन बौद्धिक संपदा के संरक्षण का बड़ा देश है, लेकिन शक्तिशाली देश नहीं है। चीन में पेटेंट संरक्षण के क्षेत्र में उच्च खर्चा और कम मुआवजा आदि समस्याएं मौजूद हैं। हालांकि चीन में पेटेंट का आवेदन करने की मात्रा क्रमशः सात सालों में विश्व के पहले स्थान पर रही, फिर भी अधिकांश पेटेंट शक्तिशाली नहीं हैं। इन समस्याओं का हल किए बिना चीन में नवाचार विकास और खुलेपन का विस्तार में पर्याप्त प्रेरणा शक्ति नहीं हासिल की जा सकती। तो कैसे मजबूत किया जा सकता है? बौद्धिक संपदा क्षेत्र के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को गहरा करना एक अहम माध्यम है। अमेरिका विश्व में समुन्नत नवाचार देश और शक्तिशाली देश है, जिस की बौद्धिक संपदा संरक्षण विधान सिस्टम भी परिपूर्ण है। 2017 में चीन ने पेटेंट के लिए अमेरिका को करीब 7.13 अरब अमेरिकी डॉलर दिये। इसी वजह से बौद्धिक संपदा संरक्षण अनेक बार चीन-अमेरिका संवाद की उपलब्धियों की सूची में शामिल किया गया है, और स्वाभाविक वह चीन-अमेरिका आर्थिक व व्यापारिक वार्ता का अहम मुद्दा भी है।

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