टिप्पणीः अमेरिकी प्रभुत्व अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को कर देगा बर्बाद

2019-07-24 18:32:00

इधर के दिनों में अमेरिका के सौ से अधिक लोगों ने संयुक्त रूप से एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर किये और चीन की आलोचना की कि चीन ने मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के सिद्धांत व नियम पर हमला किया है। उन्होंने चीन के साथ प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित किया। अमेरिकी पक्ष की ये दलील बिलकुल निराधार है, जो अहंकार और जातीय पूर्वाग्रह से भरी हुई है।

तथ्यों से साबित हो चुका है एकतरफ़ावाद और संरक्षणवाद की विशेषता वाला अमेरिकी प्रभुत्व अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बर्बाद करने वाला है।

हालिया अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित की गयी है, जिसने आम तौर पर सक्रिय भूमिका अदा की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के केंद्र वाली सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था ने कारगर रूप से विश्व शांति व विकास की कारगर रक्षा की है। लेकिन अमेरिका हमेशा यह मानता है कि अमेरिका को अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के केंद्र होना चाहिए और अमेरिका के नेतृत्व में एकतरफावादी प्रभुत्व की रक्षा की जानी चाहिए। ट्रम्प के सत्ता पर आने के बाद अमेरिका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की बर्बादी अंतर्राष्ट्रीय समाज के कल्पना से बाहर है।

एक तरफ़ अमेरिका ने टैरिफ की लाठी उठाकर चीन, मैक्सिको, कनाडा, यूरोपीय संघ और भारत आदि अनेक आर्थिक इकाइयों के खिलाफ़ व्यापारिक विवाद छेड़ा और खुलेआम विश्व व्यापार संगठन के अंतर्राष्ट्रीय कर्तव्य का उल्लंघन किया। दूसरी ओर, अमेरिका क्रमशः संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, संयुक्त राष्ट्र यूनेस्को, पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते और ईरानी नाभिकीय समझौते आदि अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व संधियों से हट गया। वहीं अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रचालन को तोड़ा और विश्व व्यापार संगठन की सुधार प्रक्रिया को रोका।

संयुक्त राष्ट्र संघ स्थित पूर्व अमेरिकी दूत बोल्टन ने खुलेआम कहा था कि अमेरिका और विश्व का संबंध हथौड़ा और कील का संबंध है। अमेरिका जिस किसी को मारना चाहता है उसे मारेगा। अमेरिकन फर्स्ट की प्रभुत्ववादी और अति स्वार्थी की विचारधारा वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की जानबूझकर बर्बादी है।

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