टिप्पणी: अमेरिका : “शून्य-राशि सोच” अपनाना हानिकारक है

2019-08-04 19:31:00

अमेरिका की हालिया घोषणा के मुताबिक वह तीन खरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाली चीनी वस्तुओं पर दस प्रतिशत का टैरिफ लगाएगा, जो कि चीन और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच संपन्न हुए ओसाका सहमति का सरासर उल्लंघन है और इससे यह जाहिर भी होता है कि अमेरिका में कुछ लोगों के पास“शून्य-राशि सोच”भी मौजूद है। इससे दोनों देशों की जनता और विश्व की जनता के हितों पर बुरा असर पड़ेगा।

“शून्य-राशि सोच”का मतलब है कि प्रतियोगिता में एक पक्ष की विजय और दूसरे पक्ष की हार होती है। हार या विजय होने से दोनों पक्षों के हितों को शून्य किया जाएगा। यह सोच हास्यास्पद और हानिकारक भी है, लेकिन अमेरिका में कुछ लोग अंतर्राष्ट्रीय मामलों में हमेशा इसे कायम करते हैं। उनका मानना है कि दूसरे देश की आर्थिक वृद्धि से अपने देश के आर्थिक लाभ को नुकसान पहुंचेगा, इसलिये इसे रोकना होगा। बीते एक साल में अमेरिका के कुछ लोगों ने चीन के साथ व्यापार वार्ता में निरंतर वादा-खिलाफी की है और चीन पर अत्याधिक दबाव बनाकर रखा हुए। इसके पीछे उनके दिमाग में“शून्य-राशि सोच”का विचार मौजूद होना प्रतीत होता है।

वास्तव में मौजूदा दुनिया में आर्थिक वैश्विकरण का रूझान अनिवार्य है। मानव का समान भाग्य वाला समुदाय संपन्न हो गया है, जिसमें“शून्य-राशि सोच” अपनाने की कोई गुंजाइश नहीं है। अमेरिका में बहुत से उद्योगधंधों और मीडिया ने इसका विरोध करते हुए वक्तव्य जारी किया। उन्होंने कहा कि चीनी वस्तुओं पर अधिक टैरिफ लगाये जाने से अमेरिकी उपभोक्ताओं को अधिक स्पष्ट नुकसान पहुंचेगा और देश में खुदरा व्यापारियों की समाप्ति और बड़े पैमाने की बेरोजगारी होगी।

विश्व बैंक ने जून माह में अपनी एक रिपोर्ट में इस वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर को 2.6 प्रतिशत तक गिराने का पूर्वानुमान लगाया। चीनी वस्तुओं पर दस प्रतिशत टैरिफ लगाये जाने से विश्व की उद्योग श्रृंखला और आपूर्ति श्रृंखला भी भंग हो जाएगी और इससे विश्व अर्थतंत्र को अधिक तौर पर नुकसान पहुंचेगा। इस तरह यह स्पष्ट है कि“शून्य-राशि सोच”अपनाने से अमेरिका को कोई लाभ नहीं मिलेगा, बल्कि इसके उलट उसे दोहरा नुकसान और बहु-नुकसान का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका के भूतपूर्व उप राष्ट्रपति वॉल्टर मोंडेले ने कुछ समय पूर्व सौ “चीन विशेषज्ञ” के पत्र पर हस्ताक्षर कर "चीन दुश्मन नहीं है" वाले विचार का समर्थन प्रकट किया, क्योंकि अधिकाधिक लोगों को महसूस है कि आर्थिक वैश्विकरण के युग में“शून्य-राशि सोच”का स्थान उभय-जीत वाले विचार से लिया जाना चाहिये।

चीन और अमेरिका विश्व में सबसे बड़े दो अर्थतंत्र हैं। उनके बीच आर्थिक व व्यापारिक समस्याएं मौजूद तो हैं, पर इनका समाधान ईमानदारी के साथ वार्ता के जरिये ही किया जाना पड़ेगा। आशा है कि अमेरिका में कुछ लोग आर्थिक विकास के नियम के मुताबिक काम करेंगे और“शून्य-राशि सोच”को छोड़कर आर्थिक वार्ता के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करेंगे। चीन अपने केंद्रीय हितों से संबंधित मुद्दों पर कतई ढील नहीं देगा। चीन का वार्ता के लिए द्वार खुला है, पर जरूरत पड़ने पर चीन व्यापार युद्ध करने से पीछे भी नहीं हटेगा।

( हूमिन )

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