टिप्पणीः चीन को विनिमय दर का नियंत्रण वाला देश घोषित करना अमेरिका की एकतरफावादी कार्यवाई

2019-08-07 11:32:00

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 6 अगस्त को चीन को विनिमय दर का नियंत्रण वाला देश घोषित किया। यह लेबल अमेरिकी वित्त मंत्रालय द्वारा खुद बनाये गये तथाकथित विनिमय दर के नियंत्रण देश के मापदंड से मेल नहीं खाता है, साथ ही यह बिलकुल एकतरफावादी और संरक्षणवादी कार्यवाई है। जिसने अंतर्राष्ट्रीय नियमों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है और इससे वैश्विक अर्थतंत्र और वित्तीय व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा।

इस साल के मई माह में अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने रिपोर्ट जारी कर कहा था कि उस के मापदंड के मुताबिक चीन ने विनिमय दर पर नियंत्रण कर अन्यायपूर्ण व्यापारिक श्रेष्ठता पाने की कोशिश नहीं की। लेकिन केवल दो महीने के बाद अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने अपने स्वयं के निष्कर्ष को पलट दिया।

विश्व व्यापार संगठन और आईएमएफ़ द्वारा संपन्न सहमति के मुताबिक आईएमएफ विनिमय दर के अंतर्राष्ट्रीय प्रबंध की विशेष संस्था है। अमेरिका को दूसरे देशों की विनिमय दर का एकतरफा आकलन करने का अधिकार नहीं है। आईएमएफ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया कि आरएमबी की विनिमय दर आम तौर पर स्थिर रही है। अमेरिका ने बहुपक्षीय नियमों का उल्लंघन कर प्रतिष्ठान संस्था के आकलन को नज़रअंदाज कर चीन पर विनिमय दर के नियंत्रण देश का लेबल लगाया। यह बिलकुल एकतरफ़ावादी और व्यापार संरक्षणवादी कार्यवाई है, जिससे उस का प्रभुत्ववादी रुख स्पष्ट होता है।

एकतरफावाद, व्यापार संरक्षणवाद और चीन पर अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने के प्रभाव से इस साल के अगस्त माह से आरएमबी की विनिमय दर में कुछ हद तक अवमूल्य हुआ है। यह बाजार की सप्लाई व मांग और अंतर्राष्ट्रीय विनिमय बाजार में डांवाडोल होने का सच्चा प्रतिबिंब है। चीन बाजार की सप्लाई व मांग के आधार पर प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय दर नीति लागू करता है। बाजार की सप्लाई व मांग विनिमय दर के पैदा होने में निर्णायक भूमिका अदा करती है। विश्व की दूसरी बड़ी आर्थिक इकाई होने के नाते चीन कभी भी प्रतिस्पर्द्धा अवमूल्य नहीं करता है और विनिमय दर को कभी व्यापारिक विवाद का निपटारा करने का साधन भी नहीं बनाया है।

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