टिप्पणीः आर्थिक मामले को राजनीतिकरण बनाने की कोशिश विफल होगी

2019-08-20 17:31:01

अमेरिका के उप-राष्ट्रपति माइक पेंस ने 19 अगस्त को डेट्रॉइट आर्थिक क्लब में भाषण दिया कि अमेरिका चीनी जनता का बड़ा सम्मान करता है। अमेरिका की चीनी बाजार को नुकसान पहुंचने की कोई मंशा नहीं है, लेकिन अगर अमेरिका चीन के साथ आर्थिक और व्यापारिक समझौता संपन्न करता है, तो चीन को सभी वचनों का पालन करना पड़ेगा, जिसमें यह भी शामिल होना चाहिए कि चीन वर्ष 1984 में संपन्न चीन-ब्रिटेन संयुक्त घोषणा के अनुसार हांगकांग के कानून की संपूर्णता का सम्मान करेगा।

उप-राष्ट्रपति पेंस का यह कथन असत्य ही नहीं बेहूदा भी है। उन्होंने खुले तौर पर आर्थिक मामले का राजनीतिकरण बनाया और चीन के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया। लक्ष्य है कि दबाव डालने से चीन को रोकने का पलड़ा बढ़ाया जाएगा। उनका उद्देश्य बहुत दुष्टकारी है।

पिछले एक साल से चीन-अमेरिका व्यापारिक वार्ता के इतिहास का सिंहावलोकन करें, तो हर बार उतार-चढ़ाव आने का कारण है कि अमेरिका ने सहमति का उल्लंघन किया और अपना वचन तोड़ा। अमेरिका एक तरफ सीमा शुल्क से दूसरों और खुद को नुकसान पहुंचाता है, वहीं दूसरी तरफ दिखावटी रूप से कहता है कि वह चीनी जनता का सम्मान करता है और चीनी बाजार को नुकसान पहुंचाना नहीं चाहता। पेंस समेत अमेरिकी अधिकारियों की कथनी-करनी में बहुत अंतर है।

पेंस द्वारा उल्लेखित चीन-ब्रिटेन संयुक्त घोषणा वर्ष 1984 में हांगकांग पर चीन की सार्वभौमिकता की बहाली और संक्रमणकाल में संबंधित प्रबंध के लिए चीन और ब्रिटेन द्वारा संपन्न राजनीतिक दस्तावेज है। 1 जुलाई 1997 को चीन में हांगकांग की वापसी के बाद घोषणा में निर्धारित ब्रिटेन से संबंधित सभी अधिकार और कर्तव्य पूरे हो चुके हैं। घोषणा ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई है। चीन सरकार संविधान और हांगकांग के बुनियादी कानून के अनुसार हांगकांग पर प्रभुसत्ता का प्रयोग करती है। अमेरिका के उप-राष्ट्रपति होने के नाते पेंस ने एक पुराने दस्तावेज से चीन के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया, न सिर्फ़ खुद की अंतर्राष्ट्रीय जगहंसाई बनायी, बल्कि अमेरिका की राष्ट्रीय छवि को भी शर्मिंदा किया।

तथ्यों से जाहिर है कि दबाव डालने से चीन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत समस्या के निपटारे की कठिनाई बढ़ाई जाएगी। चीन समानता और आपसी सम्मान के आधार पर अमेरिका के साथ वार्ता करना चाहता है। लेकिन महत्वपूर्ण और सैद्धांतिक सवालों पर चीन कतई रियायत नहीं देगा।

(ललिता)

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