​चीन के इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई जा रही है हिंदी

2019-01-16 16:03:00

स्कूल में 18 देशों के बच्चे पढ़ने आते हैं। लेकिन हिंदी मुख्यतौर पर भारतीय बच्चे ही पढ़ते हैं, पर इस बार तीन चीनी बच्चों ने भी हिंदी का विकल्प चुना है। विदेश में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए यह बड़े गौरव की बात है कि उनके बच्चे हिंदी सीख रहे हैं। स्कूल में हिंदी एलकेजी से आठवीं क्लास के बच्चों को वैकल्पिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती है। वैसे स्कूल में कुल 268 छात्र-छात्राएं हैं, जिनमें से 60 बच्चे हिंदी पढ़ रहे हैं। पहले हिंदी पहली कक्षा से पढ़ाई जाती थी। इस साल से एलकेजी और यूकेजी के बच्चों को भी हिंदी सीखने का मौका मिल रहा है। इससे पहले कुछ छात्र-छात्राएं नवीं और दसवीं हिंदी विषय से पास कर चुके हैं। हालांकि केंब्रिज यूनिवर्सिटी में हिंदी से 12वीं क्लास तक की पढ़ाई हो सकती है, शाओशिंग में अभी यह विकल्प थोड़ा मुश्किल लगता है। इस स्कूल में कुछ 50 शिक्षकों का स्टाफ है, जिनमें से सात शिक्षक भारतीय हैं। हिंदी के अलावा चीनी और स्पेनिश भाषा भी वैकल्पिक रूप में यहां छात्रों के लिए उपलब्ध है। आशीष कहते हैं कि धीरे-धीरे हिंदी की लोकप्रियता बढ़ रही है, उम्मीद है कि आने वाले समय में चीन और अन्य देशों के बच्चे भी हमारे स्कूल में हिंदी सीखेंगे।

स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थी

वहीं इस स्कूल में हिंदी विषय की शुरुआत से लेकर अब तक हिंदी पढ़ा रही शैली त्यागी ने सीआरआई को बताया कि उन्हें विदेश में हिंदी पढ़ाते हुए बहुत गर्व महसूस होता है। लखनऊ से वह 2008 में अपने पति के साथ चीन आयीं और उनके पति खछ्याओ में टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े हैं। वह कहती हैं मुझे गर्व है कि मैं इस स्कूल की पहली हिंदी टीचर हूं। शैली के मुताबिक विदेश में हिंदी सीखने का मौका हासिल होने पर बच्चों के परिजन बहुत खुश हैं, हिंदी सीखने वाले अधिकांश भारतीय बच्चे हैं। यहां हिंदी की पढ़ाई का स्तर भारत के किसी अच्छे स्कूल से कम नहीं है। हिंदी सीखने के साथ-साथ बच्चे भारत की संस्कृति और अन्य जानकारियों से भी रूबरू होते हैं। शैली क्लास में बच्चों को हिंदी के अक्षर ज्ञान के साथ-साथ लेखनी में भी निपुण बना रही हैं। बच्चों को मुहावरे, लोकोक्तियां और कविता आदि बहुत रोचक लगते हैं।

शैली के अनुसार चीनी बच्चे बहुत रुचि के साथ हिंदी पढ़ रहे हैं, लेकिन उन्हें उच्चारण संबंधी कुछ परेशानी आती हैं, जिन्हें अभ्यास से दूर कराया जाता है। लेकिन उनके परिजन बहुत खुश हैं उनके बच्चे इतनी कम उम्र से एक विदेशी भाषा सीख पा रहे हैं। इतना ही नहीं वे अकसर बच्चों को हिंदी सीखने में आने वाली परेशानियों और शब्दों को लेकर शिक्षिका के साथ चर्चा भी करते हैं।

(अनिल आज़ाद पांडेय)

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