ल्यांगचाहो (भाग 4)

2018-07-05 00:32:06

ल्यांगचाहो पहुंचते समय शी चिनफिंग ने कुछ समय अपने खर्चे पर किसानों के घर खाना खाया । लेकिन किसान उनके लिए कार्न मोमो और बीन पाउडर मोमो आदि बनाते थे, जिन्हें आम तौर पर किसान नहीं खा पाते थे। खाना खाते समय किसानों के बच्चे पास खड़े होकर उन्हें खाते हुए देखते थे।

गांव में जीवन और पेइचिंग के जीवन में बहुत भारी अंतर था। लेकिन गांव में शिक्षित युवा युवाओं का जीवन भी स्थानीय किसानों से बेहतर होता था। ल्यांगचाहो में हर महीने किसानों को सिर्फ़ 10 किलोग्राम अनाज मिलता था, जो शिक्षित युवाओं के राशन का करीब आधा होता था। भर पेट खाने के लिए किसानों को पत्तियां और सॉसिसल(Sowthistle) आदि चीजें खानी पड़ती थी।

बाद में शिक्षित युवा खुद खाना पकाने लगे, उस समय उन्हें पता चला कि खाना पकाना एक आसान बात नहीं है। पहला लकड़ी की समस्या थी। पहाड़ पर कुछ नहीं था, पेड़ नहीं थे, यहां तक कि झाड़ी भी नहीं थी। ऐसे में लोग लकड़ी कहां से लाएं।

स्थानीय किसान दैनिक जीवन में तो लकड़ी इकट्ठा करने की कोशिश करते थे। बाढ़ आते समय उन्होंने नदियों के बाढ़ से नीचे आने कुछ लकड़ियां को पकड़ने की कोशिश की। इसके अलावा किसानों को चट्टानों पर चढ़कर झाड़ी काटकर लानी होती थी। कई लोग इन खतरनाक चट्टानों से नीचे गिरकर घायल हुए, जबकि कुछ की मौत भी हो गई।

शिक्षित युवा चट्टान पर नहीं चढ़ सकते थे। उन्होंने पर्वत से कुछ घास लाने की कोशिश की। लेकिन स्टोव में डालने के कुछ ही मिनट में घास तुरंत जली गयी। शिक्षित युवा बहुत मुश्किल से खाना पका सकते थे। इसलिए भूख लगना इन युवाओं के लिए सामान्य बात थी।

उनके जीवन में सुधार करने के लिए गांव के नेताओं ने कभी कभार गेहूं का आटा बनाकर शिक्षित युवाओं को दिया और उन्हें बड़ी मदद दी। किसान गोंग जंगफू को याद है कि एक बार शी चिनफिंग सफेद मोमो को लेकर पर्वत पर चढ़े। दोपहर को जब उन्होंने किसान को उबली हुई मक्के की रोटी (steamed corn bread) खाते हुए देख उनसे सफेद मोमो खाया नहीं गया। उन्होंने सफ़ेद मोमो महिला किसानों को दे दिया और खुद कुछ भी नहीं खाया।

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