टिप्पणी: हांगकांग मामले और चीन के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने वाली षड़यंत्र जरूर विफल होगी

2019-07-03 16:40:00

1 जुलाई को हांगकांग के मातृभूमि में वापसी की 22वीं जयंती है। कुछ चरमपंथियों ने हांगकांग कानून निर्माण परिषद की इमारत में घूसकर महा विनाश किया। इस हिंसक कार्रवाई से हांगकांग के कानूनी शासन को पैरों तले रौंदा गया और हांगकांग के सामाजिक स्थिरता को नुकसान पहुंचाया गया, जिस की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कड़ी निंदा की। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ आदि पक्षों ने स्वतंत्र और मानवाधिकार की आड़ में तथाकथित “शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार” की रक्षा करने को कहा। उन्होंने हिंसक अपराध के खिलाफ़ दोहरा मापदंड अपनाया और हांगकांग व चीन के अंदरूनी मामले में अनैतिक हस्तक्षेप किया। चीन इसके प्रति बड़ा असंतोष और दृढ़ विरोध करता है।

कानूनी शासन हांगकांग की जड़ है। गत फरवरी में हांगकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र की सरकार ने भगौड़ों के प्रत्यर्पण से संबंधित दो नियमों का संशोधन कार्य शुरु किया, जिसका उद्देश्य प्रत्यर्पण मामले का निपटारा करना और कानून व्यवस्था में मौजूद कमियों को पूरा करना है, ताकि हांगकांग “अपराधियों का स्वर्ग” न बने। लेकिन हांगकांग समाज में इसके प्रति अलग आवाज़ सुनाई दे रही है। इसका विरोध करने वाले कुछेक लोगों ने सड़क पर जुलूस निकाला और यहां तक कि उत्पात मचाया। विशेष प्रशासनिक क्षेत्र की सरकार ने नियम संशोधन कार्य को अस्थाई तौर पर बंद किया, ताकि समाज की व्यापक आवाज़ सुन सके और समान रुप से कानूनी शासन की प्रगति को आगे बढ़ाया जा सके।

लेकिन कुछ चरमपंथियों ने इस मामले को बहाना बनाकर अपना निजी राजनीतिक इरादे की प्राप्ति के लिए हांगकांग में उथल-पुथल किया। उन्होंने जानबूझकर 1 जुलाई वाला दिवस चुना। यह दिन चीन की मातृभूमि में हांगकांग की वापसी की जयंती दिवस है। 1 जुलाई की सुबह प्रदर्शनकारी पुलिस का मुकाबला करते हुए मार्गों को बाधित किया और अज्ञात तरल पदार्थों का प्रयोग कर पुलिसकर्मियों पर प्रहार किया। दोपहर के समय, प्रदर्शनकारियों ने लोहे की छड़ें आदि वस्तुओं का प्रयोग कर इमारत की खिड़कियों की बाहरी दीवार को नष्ट किया और जहरीले रासायनिक पाउडर से पुलिसकर्मियों पर हमला किया। रात को इमारत में घुसकर अंदर तहस-नहस किया, मीटिंग हॉल और विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के चिह्न को नष्ट किया। चरमपंथियों की हिंसक कार्रवाई से हांगकांग की स्थिति खतरे में पड़ गई और यहां के कानूनी शासन को पैरों तले रौंदा गया। यह“एक देश दो व्यवस्थाओं”की खुले आम चुनौती है। किसी भी प्रभुसत्ता वाला देश इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकता और कानून के अनुसार इसका सख्ती से निपटारा करेगा।

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