टिप्पणी : ट्रम्प के शासन काल में अमेरिका-यूरोप ढांचागत चोट का इलाज नहीं

2018-08-03 17:32:07

दूसरा, शीत युद्ध के बाद यूरोप का एकीकरण पश्चिमी यूरोपीय आर्थिक समुदाय से यूरोपीय संघ तक उन्नत हुआ, जो कि दुनिया भर में राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव तेज़ी से बढ़ गया। वह अमेरिका के बराबर होने लगा। दोनों की शक्ति में बड़ा परिवर्तन आया है।

नम्बर एक, यूरोपीय संघ ने सार्वजनिक रूप से घोषित किया कि वह उच्च स्तरीय वैश्विकरण पर अति अलगाव वाली दुनिया में वैश्विक शासन का कोर और मिसाल बनना चाहता है। कुछ अंतरराष्ट्रीय मामलों में यूरोप बहुपक्षवाद की विचारधारा पर डटा रहता है और वह अमेरिका को“नहीं”बोल सकता है और उसने अमेरिका की निंदा की कि उसने शीत युद्ध के बाद सबसे ज्यादा युद्ध छेड़ा है। यूरोपीय संघ ने अमेरिका की तथाकथित“विश्व सैन्य पुलिस”की हैसियत को अस्वीकार किया। साल 2003 में फ्रांस और जर्मनी के नेतृत्व में अमेरिका के इराक पर आक्रमण युद्ध का विरोध किया और इसके विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष किया। साथ ही साथ भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज वॉकर बुश के कई सैन्य विचारों को मान्यता नहीं दी। वहीं, अमेरिका ने गठबंधन की स्थापना कर यूरोपीय देशों का बंटवारा करना चाहा।

नम्बर दो, यूरोप ने नाटो से नई स्थिति के अनुसार सुधार करने की मांग की, ताकि यूरोप को बोलने का अधिकार उन्नत हो सके और रूस के मुकाबले के साथ-साथ यूरोप की सुरक्षा स्थिति का खूब नियंत्रण किया जा सके। इसके लिए यूरोप ने नाटो में यूक्रेन और जॉर्जिया की सदस्यता अस्वीकार की और यूरोपीय संघ की सुरक्षा रणनीति बनाकर प्रतिरक्षात्मक संयुक्त कदम उठाए। वहीं अमेरिका ने एक तरफ़ यूरोप से नाटो के सैन्य खर्च को बढ़ाने और नाटो के बंदोबस्त का पालन करने का आग्रह किया। दूसरी तरफ़ उसने यूरोपीय संघ के संयुक्त प्रतिरक्षा के विकास को भी बाधित किया।

नम्बर तीन, अमेरिका और यूरोप के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्र से जुड़ी वार्ता मुश्किल रही, जो आज तक स्थगित है। दोनों पक्ष खुद के हितों का ज्यादा ख्याल रखते हैं। यूरोप ने अमेरिका की निंदा की कि उसने वित्तीय संकट को यूरोप तक पहुंचाया। अमेरिका ने यूरोपीय आर्थिक शक्ति की वृद्धि और स्वयं ही संकट से बाहर निकलने पर ईर्ष्या हुई और यूरोप पर लगाम कसने लगा। यूरोप को ऋण संकट का सामना करने के दौरान अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने शीघ्र ही यूरोप के वित्तीय संस्थाओं के क्रेडिट स्तर को कम किया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) द्वारा यूरो क्षेत्र को पूंजी सहायता देने का विरोध किया। इसके साथ ही अमेरिका ने यूरो क्षेत्र और यूरोपीय संघ विफल होने का एलान भी किया।

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