देका काउंटी में गरीब लोगों को निःशुल्क उपचार देता एक अस्पताल

2017-09-27 00:48:00

तिब्बती उपचार एक पारंपरिक और प्राचीन विधा है, जिसमें नब्ज, चेहरे, जीभ, आंखों व सुबह के यूरिन आदि की जांच व मरीज से बातचीत के आधार पर रोग का पता लगाया जाता है और फिर उसी के आधार पर रोगी का उपचार भी किया जाता है। तिब्बत की विश्व प्रसिद्ध परंपरागत दवाओं का इतिहास कई हजारों साल पुराना है। दक्षिणी पश्चिम चीन में सछ्वान प्रांत के कांजी तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र में देका काउंटी स्थित देका जोंगसा तिब्बती अस्पताल तिब्बती उपचार के लिए जाना जाता है। यहां गरीब लोगों का निःशुल्क उपचार किया जाता है।

इस अस्पताल का निर्माण साल 1975 में हुआ, जहां तिब्बती चिकित्सा पद्धति से मरीजों का उपचार किया जाता है। 7 एकड़ जमीन पर फैले इस अस्तपातल में बहिरोगी चिकित्सालय, दवाखाना, और दवाईयों का गोदाम है। इसके अलावा, इस अस्पताल में तिब्बती चिकित्सा के 5 चिकित्सकों की एक टीम, लंबी-अवधि के 20 कर्मचारी, और कम-अवधि के कुछ कामगार भी हैं। मौजूदा समय में, परंपरागत तिब्बती दवाओं पर लंबी-अवधि के व्यवस्थित प्रशिक्षण लेने के लिए पांच प्रान्तों के तिब्बती क्षेत्रों से आने वाले 30 प्रशिक्षुएं हैं। प्रशिक्षण कक्षाओं में तिब्बती दवाओं का पारंपरिक सांस्कृतिक ज्ञान, तिब्बती दवाइयों की फार्मेसी, औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान, नैदानिक अभ्यास आदि शामिल हैं।

देका जोंगसा तिब्बती अस्पताल एक सामान्य अस्पताल के रूप में संचालित होता है, और नौ पड़ोसी कस्बों जिसमें कुल मिलाकर लगभग सौ प्रशासनिक गांव शामिल हैं, की चिकित्सा देखभाल करने की जिम्मेदारी उठाता है। यह अस्पताल हर साल गरीब लोगों में 10 लाख युवान की मूल्य की दवाईयां निःशुल्क वितरित करता है। इसके अलावा, यह अस्पताल तिब्बत के छांगतू, छिंगहाई के यूशु, कान्सू के कान्नान, युन्नान के तिछिंग आदि के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तिब्बती दवाईयां और तिब्बती चिकित्सकों का प्रशिक्षण प्रदत्त करता है। इस अस्पताल को दवाईयां बेचकर जो आय प्राप्त होती है, उन्हें गरीब लोगों के कल्याण में लगा दिया जाता है।

तिब्बती चिकित्सा की खास बात यह है कि इसमें अधिकतर वनस्पतियों, जड़ियों, हिरण के सींग वगैरह से ही दवाइयां बनती हैं। यहां वनस्पतियों के भी सैंपल मर्तबानों में रखे देखे गये। वैसे यहां के चिकित्सकों का कहना है कि तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर पड़ोसी देश जैसे भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार का कुछ असर है।

(अखिल पाराशर)

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