तिब्बती पठार पर आशा और भविष्य के लिए कोशिश करने का जूंग यांग

2018-05-03 15:02:20

तिब्बती पठार पर आशा और भविष्य के लिए कोशिश करने का जूंग यांग

उन्हों ने तिब्बत में पेड़ पौधों के अनुसंधान में भारी योगदान पेश किया। पर दुखः की बात है कि वर्ष 2017 की 25 सितंबर को यातायात दुर्घटना की वजह से प्रोफेसर जूंग यांग का निधन हुआ। सहपाठियों का ऐसा मूल्यांकन है कि प्रोफेसर जूंग यांग ने अपनी 53 सालों की जिंदगी में सौ वर्ष का काम पूरा किया है।

लेकिन प्रोफेसर जूंग यांग ने पेड़ पौधों के बीजों का संग्रह क्यों किया ? इस बात की चर्चा करते हुए प्रोफेसर जूंग यांग ने निधन से पहले एक भाषण देते समय बीज एकत्र करने के महत्व की जानकारी दी। प्रोफेसर जूंग यांग ने अपने भाषण में कहा कि वनस्पति विशेषज्ञों का मानना है कि जीन के अनुसंधान से किसी एक देश को बचा सकता है, और एक ही बीज के संरक्षण से हजारों लोगों को फायदा प्राप्त हो सकेगा। तिब्बती पठार को चीन में सबसे बड़ा जैविक "जीन बैंक" माना जाता है। लेकिन खराब वातावरण की वजह से वहां के वनस्पतियों के बीजों का अनुसंधान करने वाले विशेषज्ञ बहुत कम हैं। वर्ष 2001 में प्रोफेसर जूंग यांग ने तिब्बत में वनस्पतियों का अनुसंधान करने के लिए तिब्बती विश्वविद्यालय में काम करना शुरू किया।  

प्रोफेसर जूंग यांग के एक छात्र जू पीन के अनुसार तिब्बती पठार पर वनस्पतियों के बीज़ एकत्र करने का काम बहुत कठीन है। प्रत्येक नमूने के लिए 5000 बीज जमा करना पड़ता है। विभिन्न नमूने के स्थानों के बीच की दूरी कम से कम 50 किलोमीटर होना चाहिये। उन्हों ने कहा,“निम्न ऊंचाई के क्षेत्रों की तुलना में तिब्बती पठार पर काम करना बिल्कुल अलग है। हल्के हल्के काम करने से भी लम्बे सांस लेना पड़ता है।”

प्रोफेसर जूंग यांग ने तिब्बत में कुल 16 सालों के लिए काम किया। उन्हों ने तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों में कुल पांच लाख किलोमीटर का रास्ता नाप किया था। उन्हों ने तिब्बत में सबसे सुनसान व दूरस्थ क्षेत्रों में चार करोड़ से अधिक बीज़ों का संग्रह किया और विश्व के जर्मप्लाज्म संसाधन के नामसूची का भी विस्तार किया। प्रोफेसर जूंग यांग के एक छात्र, तिब्बती विश्वविद्यालय के लाइफ साइंसेज विभाग के प्रोफेसर लाजूंग ने प्रोफेसर जूंग यांग की याद करते हुए कहा कि वर्ष 2013 में जब जुम्लामा चोटी के नज़दीक में काम कर रहे थे, तब प्रोफेसर जूंग यांग को पठार की बीमारी से जीवन खतरे का सामना पड़ता था।

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