मध्य प्रदेश में कुपोषण का काल- पहला भाग

2017-04-21 20:21:45


मध्य प्रदेश में कुपोषण का काल- पहला भाग


आज हम कुपोषण से जुड़ी एक रिपोर्ट साझा करना चाहते हैं। इस रिपोर्ट के लेखक हैं जावेद अनीस, जो एक स्तंभकार व समाजसेवी हैं।

विदिशा के जिला अस्पताल में भर्ती एक साल के नन्हे सुरेश के शरीर से जब ब्लड सैंपल लेने की जरूरत पड़ी तो उसकी रगों से दो बूंद खून निकालने के लिए भी डाक्टरों को बहुत मुश्किल पेश आयी। दरअसल गंभीर रूप से कुपोषित होने की वजह से उसका वजन मात्र 3 किलो 900 ग्राम ही था जबकि एक साल के किसी सामान्य बच्चे का औसत वजन 10 किलो होना चाहिए। आखिरकार इस बच्चे को बचाया नहीं जा सका और सूबे के लाखों बच्चों की तरह उसकी भी कुपोषण से मौत हो गयी। यह घटना मध्यप्रदेश में कुपोषण की त्रासदी का मात्र एक उदाहरण है। सुरेश की तरह प्रदेश के सैकड़ों बच्चे हर रोज कुपोषण व बीमारी से जिन्दगी और मौत के बीच जूझने को मजबूर हैं।

ज्यादा दिन नहीं हुए जब मध्य प्रदेश में सरकार ने 'आनंद मंत्रालय' खोलने की घोषणा की, मंत्रालय खुल भी गया। लेकिन अब इसी मध्यप्रदेश सरकार को कुपोषण की स्थिति को लेकर श्वेत पत्र लाने को मजबूर होना पड़ा है। करीब एक दशक बाद जब प्रदेश में कुपोषण की भयावह स्थिति एक बार फिर सुर्खियां बनने लगीं तो विकास के तथाकथित मध्यप्रदेश मॉडल के दावे खोखले साबित होने लगे। जमीनी हालात बता रहे हैं कि तमाम आंकड़ेबाजी और दावों के बावजूद मध्यप्रदेश बीमारु प्रदेश के तमगे से बहुत आगे नहीं बढ़ सका है।

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