मध्य प्रदेश में कुपोषण का काल- दूसरा भाग

2017-04-27 17:24:06

मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों को कुपोषण और विकास संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गरीबी इसका मूल कारण है, उनके आहार में दुग्ध उत्पादों, फलों और सब्जियों की मात्रा ना के बराबर होती है और केवल 20 फीसदी आदिवासी परिवारों में स्वच्छ पेयजल की सुविधा है। भारत सरकार द्वारा जारी ‘‘रिर्पोट ऑफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनॉमिक, हेल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस ऑफ ट्राइबल कम्यूनिटी’’ 2014 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 113 है। इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है, वहीं प्रदेश में यह दर 175 है, आदिवासी समुदाय में टीकाकरण की स्थिति चिंताजनक है। रिर्पोट के अनुसार देश में 12 से 23 माह के बच्चों के टीकाकरण की दर 45.5 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 24.6 है। 2015 की कैग रिपोर्ट ने जिन आदिवासी बाहुल्य राज्यों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाये थे उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है। इस रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में कुपोषण पर प्रदेश सरकार के प्रयास नाकाफी बताए गए हैं। कैग रिपोर्ट के मुताबिक तेरह जिलों में आंगनवाड़ियों में पोषण आहार के बजट में गड़बडियां पायी गयी। रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों की आंगनवाड़ियां सुचारु रुप से संचालित नहीं हैं और वहां पोषण आहार का वितरण ठीक से नहीं होता।

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