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तटस्थ और संतुलित विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा भारत

criPublished: 2022-04-06 16:35:11
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रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूं तो पूरी दुनिया के प्रभावित किया है, लेकिन भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। शीत युद्ध के बाद भारत के समक्ष संभवत: यह पहला मौका है, जिसमें उसकी कूटनीति कसौटी पर है। इस कसौटी पर भारत सफल होता नजर आ रहा है। भारत ने जिस तरह इस मसले पर तटस्थता की नीति को अपनाया है, उसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हो रही है। रूस ने जहां खुलकर भारत की इस नीति की प्रशंसा की है, वहीं चीन भी भारत के इस कदम के साथ अपनी तरह से सहमति जता चुका है। पिछले हफ्ते भारत आए रूसी विदेश मंत्री सरगेई लावरोव ने साफ कहा कि उनके राष्ट्रपति ने भारत को धन्यवाद कहा है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली यात्रा का उद्देश्य भी प्रकारांतर से भारत की तटस्थ नीति का ही साथ देना रहा। पाकिस्तान में अब भूतपूर्व हो चुके प्रधानमंत्री इमरान खान भी खुलकर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की तारीफ ही की है।

पिछली सदी के आखिरी दशक में सोवियत संघ के ढह जाने के बाद एक तरह से दुनिया एकतरफा हो गई थी। नौ नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरना अमेरिका की अगुआई वाले पश्चिमी देशों की बड़ी जीत थी। इसके करीब दो साल बाद यानी 26 दिसंबर 1991 को जब सोवियत संघ ढह गया तो जैसे अमेरिकी अगुआई वाले पश्चिमी देशों को खुला मैदान मिल गया। इसके बाद शीतयुद्ध का एक तरह से खात्मा हो गया। दुनिया एक तरफा होती चली गई। इसी बीच क्रोनी कैपटलिज्म के प्रभाव में पूरी दुनिया आ गई। इसी दौर में ग्लोबल विलेज यानी वैश्विक गांव की अवधारणा आई। संचार क्रांति ने दुनिया को सचमुच एक सिरे से बांध दिया। कुछ-एक अपवादों को छोड़ दें तो आज पूरी दनिया पर उदारीकरण की व्यवस्था ही आर्थिक क्षेत्र में राज कर रही है। एक पार्टी की सरकार वाले देश हों या तानाशाही वाले या पश्चिमी मॉडल के लोकतंत्र वाले, हर जगह एक ही आर्थिकी काम कर रही है या जहां नहीं कर रही है, वहां वह परोक्ष रूप से अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है।

ग्लोबल विलेज की अवधारणा स्वीकार किए जाते वक्त पश्चिमी देशों ने तर्क दिया था कि नई आर्थिकी का मकसद दुनिया में बराबरी लाना रहा। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। वास्तविकता थी कि पश्चिमी देश पूरी दुनिया को नई आर्थिकी के तहत अपने प्रभाव में लेना चाहते थे। लेकिन इस बीच चीन और भारत जैसे देशों ने उन्हीं आर्थिक नीतियों के जरिए जबरदस्त प्रगति की। चीन आज दुनिया की दूसरे नंबर की आर्थिक महाशक्ति है तो भारत भी पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर लगातार आगे बढ़ रहा है। भारत के पास अपना विशाल मध्यवर्ग है। जिसे दुनिया अपना सबसे बड़ा बाजार मानती हैं। यही वजह है कि आज रूस से भारत से सस्ता तेल खरीद भी रहा है और उन पश्चिमी देशों से कुछ करते नहीं बन पा रहा है।

दरअसल शीत युद्ध के पहले से ही भारत की रूस से दोस्ती रही है। भारत के संजीदा मामलों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में लगातार रूस ने ही भारत का साथ दिया है। भारत की सैन्य रणनीति और उत्पादन में रूस ने लगातार साथ दिया है। इसलिए भारत उसे छोड़ भी नहीं सकता। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में जब भी यूक्रेन का मामला सामने आया, भारत ने मतदान से अनुपस्थित रहा और अपना तटस्थ रूख अख्तियार किया। हालांकि अमेरिका की ओर से भारत को समझाने की कोशिशें भी खूब हुईं। लेकिन भारत ने रूस के खिलाफ कदम नहीं उठाए।

सोवियत संघ के गिरने के बाद से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की धार लगातार धीमी पड़ती गई है। जब तक शीत युद्ध का माहौल था, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अपनी धमक थी, जिसमें क्यूबा जैसे देश भी भारत के सहयोगी थे। बहरहाल नई आर्थिकी के दौर में लंबे समय तक कोई भी देश नहीं चाहेगा कि भारत के विशाल मध्यवर्ग से दूर हो। इसके साथ ही इस बीच भारतीय नेतृत्व भी वैश्विक पटल पर मजबूती से उभरा है। जो अब झुकना नहीं जानता। भारत की वैसे ही नीति रही है कि वह किसी दूसरे देश में ना तो दखल देगा और ना ही दूसरे देश की अपने अंदरूनी मामले में दखलंदाजी बर्दाश्त करेगा। इस नीति पर चलते हुए भारत ने अंतरराष्ट्रीय राजनय के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।

जिस समय रूसी विदेश मंत्री सरगेई लावरोव भारत यात्रा पर थे, उसी वक्त ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज ट्रस भी भारत की यात्रा पर थीं। लिज ने क्या प्रस्ताव दिया, यह तो अभी तक जाहिर नहीं हुआ है। लेकिन रूसी विदेश मंत्री रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत को मध्यस्थता का प्रस्ताव तक दे चुके हैं। इसके पहले भारत की यात्रा पर अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारतीय मूल के दलीप सिंह भी आ चुके हैं। रूसी विदेश मंत्री के पहले यूक्रेन के विदेश मंत्री और यूक्रेन के भारत में राजदूत भारत को लड़ाई में मध्यस्थता करने को कह चुके हैं। जाहिर है कि दोनों पक्षों के लिए भारत इन दिनों अहम हो चुका है। वह अपनी बात भी कर रहा है, रूस से सस्ती दर पर तेल खरीदने की तैयारी में है। हालांकि इसकी कीमतें अभी तक खुलकर सामने नहीं आ पाई हैं। वहीं यूक्रेन और रूस दोनों भारत को मध्यस्थता का प्रस्ताव तक दे चुके हैं। इस बीच पश्चिमी देश भारत को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत रूस का साथ ना दे।

ऐसे वक्त में भारत ने जिस संतुलन का परिचय दिया है, उसकी वैश्विक प्रशंसा होनी ही थी। भारत में अमेरिकी, ब्रिटिश, रूसी और चीनी राजनयिकों, विदेशमंत्रियों की यात्रा का मतलब स्पष्ट है कि भारत नए भू राजनैतिक हालात में भारत की स्थिति अलग और विशिष्ट बन गई है। एक बार फिर दो ध्रुवीय होती दुनिया में दोनों ध्रुवों की उम्मीदें भारत की ओर होने का संकेत साफ है कि अब भारत की तटस्थ विदेशनीति को अनदेखा कर पाना दुनिया के लिए आसान नहीं होगा। भारत हो सकता है कि आने वाले दिनों में दुनिया के संतुलन की धुरी बने।

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